पाठ-8
उषा
शमशेर बहादुर सिंह✍शमशेर बहादुर सिंह का परिचय
👉जन्म : 13 जनवरी 1911
👉निधन : 1993
👉जन्म-स्थान : देहारादून, उत्तराखंड
👉माता-पिता : प्रभुदेई और तारीफ सिंह
👉शिक्षा : 1928 में हाई स्कूल, 1931 में इंटर, 1933 में बी.ए, 1938 में एम.ए
👉पारिवारिक जीवन
:1929 में धर्म देवी से विवाह । 1933 में पत्नी की मृत्यु । फिर
परिवार विहीन अनिश्चित जीवन ।
👉यात्रा : 1978 में सोवियत रूस की यात्रा ।
👉कृतियाँ : 1932-33 में लिखना शुरू किया । दूसरा सप्तक (1951),
कुछ कविताएँ (1959),
कुछ और कविताएँ (1961),
चुका भी नहीं हूँ मैं (1975),
इतने पास अपने (1980),
उदिता (1980),बात बोलेगी (1981),
काल तुझसे होड़ है मेरी (1982),
टूटी हुई बिखरी हुई,
कहीं बहुत दूर सेसुन रहा हूँ,
सुकून की तलाश (गजलें) । प्रतिनिधि
कविताएँ (सं० डॉ० नामवर सिंह) - सभी कविताएँ । डायरी,
विविध प्रकार के निबंध एवं आलोचना
भी फुटकर रूप में प्रकाशित ।
USHA KAVITA KA BHAVARTH
प्रात नभ था बहत नीला शंख जैसे
भोर का नभ
राख से लीपा हआ चौका
[अभी गीला पड़ा है]
भावार्थ - इस कविता में
कवि ने सुबह के समय के आसमान का सुंदर वर्णन किया है। वे कहते हैं कि सूरज निकलने
से पहले आसमान नीले शंख की तरह चमकता है। इसका रंग हल्का नीला और शांति से भरा
होता है।
फिर कवि भोर के आकाश की तुलना उस चौके (रसोई की मिट्टी की जमीन) से
करते हैं जिसे राख से लीपा गया हो और जो अभी गीला पड़ा हो। इसका मतलब यह है कि
सुबह का आसमान हल्की रोशनी और नमी से भरा होता है, जैसे
अभी-अभी किसी ने उसे संवारकर छोड़ दिया हो।
कुल मिलाकर, यह पंक्तियाँ सुबह की ताजगी,
शीतलता और सौंदर्य को दर्शाती हैं।
बहत काली सिल जरा
से लाल केसर से
कि
जैसे धूल गई हो
स्लेट पर या लाल
खड़िया चाक
मल
दी हो किसी ने
भावार्थ - इन पंक्तियों में कवि ने भोर के
समय के आकाश के रंगों का सुंदर चित्रण किया है। वे कहते हैं कि यह ऐसा लगता है
जैसे एक काली सिल (पत्थर की चक्की) पर हल्का लाल केसर लगा हो, जिसे धो दिया गया हो, लेकिन उसकी हल्की लाली अब भी
बनी हुई हो।
फिर वे इसकी तुलना स्लेट (जिस पर बच्चे लिखते हैं) से करते हैं,
जिस पर किसी ने लाल रंग की खड़िया चाक रगड़ दी हो। इसका अर्थ यह है
कि सुबह के समय आसमान में हल्का काला और लाल रंग मिश्रित होता है, जो धीरे-धीरे बदलता है।
कवि इस सुंदर दृश्य के माध्यम से सुबह की कोमल रोशनी और रंगों के
परिवर्तन को दर्शा रहे हैं।
नील जल में या किसी की
गौर झिलमिल देह
जैसे हिल रही हो।
भावार्थ - इन पंक्तियों में कवि भोर के समय
के आकाश और प्रकाश के सौंदर्य का वर्णन कर रहे हैं। वे कहते हैं कि नीला आकाश ऐसा
प्रतीत हो रहा है जैसे कोई शांत जल का बड़ा सा तालाब हो।
सूर्योदय का दृश्य ऐसा लगता है जैसे कोई सुंदर, गोरी झिलमिलाती देह (शरीर) नीले जल में हौले-हौले हिल रही हो। इसका अर्थ
यह है कि सूरज की हल्की रोशनी नीले आकाश में धीरे-धीरे फैल रही है, जिससे आकाश और अधिक सुंदर लगने लगता है।
कवि ने यहाँ भोर के सौंदर्य को एक सुंदर स्त्री की झिलमिलाती देह के
माध्यम से व्यक्त किया है, जिससे यह दृश्य और भी आकर्षक और
कोमल प्रतीत होता है।
और …..
जादू टूटता है इस उषा का अब सूर्योदय हो रहा है।
भावार्थ - इन पंक्तियों में कवि भोर के समय
के जादुई सौंदर्य का वर्णन करते हैं और बताते हैं कि यह अद्भुत दृश्य अब समाप्त
होने वाला है।
वे कहते हैं कि उषा (सुबह की पहली रोशनी) का जादू अब टूटने लगा है
क्योंकि सूर्योदय हो रहा है। यानी, जब तक सूरज पूरी तरह से
नहीं निकलता, तब तक आकाश में रंगों का अद्भुत खेल चलता रहता
है—हल्का नीला, गुलाबी, नारंगी,
सुनहरा—जो पूरे वातावरण को सतरंगी बना देता है। लेकिन जैसे ही सूरज
पूरी तरह प्रकट होता है, वह जादुई दृश्य समाप्त हो जाता है
और दिन का उजाला फैल जाता है।
इस प्रकार, कवि ने सुबह के सौंदर्य को जादू
जैसा बताया है, जो सूर्योदय के साथ समाप्त हो जाता है।
USHA KAVITA KA SARANSH
शमशेर बहादुर सिंह की कविता
उषा
में सूर्योदय से पहले के सुंदर
दृश्य का वर्णन किया गया है। कवि बताते हैं कि आकाश गहरा नीला और स्वच्छ है,
जिसमें हल्की उजली आभा झलकने लगती
है। यह दृश्य राख से लीपे हुए गीले चौके जैसा लगता है। धीरे-धीरे लालिमा उभरती है, जैसे काली सिल पर केसर मल दी गई हो
या स्लेट पर लाल चॉक रगड़ दिया गया हो। उषा का प्रकाश ऐसा प्रतीत होता है जैसे
नीले जल में कोई गोरी स्त्री झिलमिला रही हो। लेकिन सूरज निकलते ही यह जादुई दृश्य
समाप्त हो जाता है और आकाश स्पष्ट हो जाता है
USHA KAVITA OBJECTIVE QUESTION
1.
शमशेर ने कब लिखना प्रारम्भ किया ?
a) 1932-33
b) 1933-34
c) 1931-32
d) 1930-31
2.
उषा कविता के कवि कौन है?
a)रघुवीर सहाय
b)शमशेर बहादुर सिंह
c)जयशंकर प्रसाद
d)अशोक वाजपेयी
3.
दूसरा सप्तक कब प्रकाशित हुआ ?
a) 1950
b) 1951
c) 1952
d) 1953
4.
शमशेर को किस नाम से पुकारा जाता था ?
a) कवियों के शेर
b) आवारा मसीहा
c) कवियों के कवि
d) व्यथित हृदय
5.
उषा का जादू कब टूट जाता है?
a)सूरज डूबने के बाद
b)सूरज निकलने के बाद
c)चाँद निकलने के बाद
d)इनमे से कोई
6.
शमशेर बहादुर सिंह का जन्म कब हुआ था?
a)1911
b)1910
c)1920
d)1915
7.
शमशेर बहादुर सिंह का जन्म कहा हुआ था?
a)बिहार
b)उत्तर प्रदेश
c)उतरखंड
d)बंगाल
8.
शमशेर की प्रतिनिधि कविताएं नामक काव्य कृति का संपादन किसने किया है?
a)डॉ नामवर सिंह
b)डॉक्टर काशीनाथ सिंह
c)डॉक्टर दूधनाथ सिंह
d)डॉक्टर बच्चन सिंह
9.
काल तुझसे होड़ है मेरी, टूटी हुई बिखरी हुई, कहीं बहुत दूर से सुन रहा हूं, सुकून की तलाश आदि किसकी रचनाएं हैं?
a)शमशेर बहादुर सिंह
b)नामवर सिंह
c)मैनेजर पांडेय
d)विश्वनाथ तिवारी
10. शमशेर ऐसे कवि हैं जो
अपना असर धीरे - धीरे डालते हैं । ' यह कथन किसका है ?
a) डॉ . नामवर सिंह
b) अज्ञेय
c) अरुण कमल
d) प्रभाकर माचवे
11. शमशेर बहादुर सिंह ने
किस स्थान से बी.ए. किया?
a)पटना
b)इलाहाबाद
c)मुंबई
d)देहरादून
12. शमशेर बहादुर सिंह के
माता पिता का नाम क्या था?
a)प्रगति देवी एवं
तारिफ सिंह
b)प्रेमदेई एवं तारीफ सिंह
c)प्रभूदेई एवं तारीफ सिंह
d)समदेई एवं तारीफ
सिंह
13. “जादू टूटता है इस उषा
का अब सूर्योदय हो रहा है” यह पंक्ति किस कविता से ली गई है?
a)उषा
b)पुत्र-वियोग
c)गांव का घर
d)हार जीत
14. शमशेर बहादुर सिंह की
पत्नी का नाम क्या है?
a)कर्म देवी
b)धर्म देवी
c)रीता देवी
d)इनमें से कोई नहीं
15. प्रभातकालीन अकाश कैसा
है?
a)कलम के रंग जैसा
b)नीले शंख जैसा
c)काली सिल के जैसा
d) उजली शिप के जैसा
16. किस का जादू टूटता है?
a)उषा का
b)संध्या का
c)रजनी का
d)नायिका के सौंदर्य का
17. “चुका भी नहीं रहा हूं
मैं” के रचयिता कौन है?
a)शमशेर बहादुर
b)मलिक मोहम्मद जायसी
c)रघुवीर सहाय
d)गजानंद
18. शमशेर बहादुर सिंह ने
किस कोश का संपादन किया?
a)हिंदी-अंग्रेजी कोश
b)उर्दू-अंग्रेजी कोश
c)उर्दू-हिंदी कोश
d)इनमें से कोई नहीं
19. शमशेर बहादुर सिंह ने 1978 में
किस देश की यात्रा की?
a)संयुक्त राज्य
अमेरिका
b)सोवियत रूस
c)नेपाल
d)फ्रांस
ANSWER
1.a 2.b 3.b 4.c 5.b 6.a 7.c 8.a 9.a 10.c
11.b 12.c 13.a 14.b 15.b 16.a 17.a 18.c 19.b
USHA KAVITA QUESTION ANSWER
1. प्रातः काल का नभ कैसा था?
उत्तर- प्रातः काल का नभ बहुत नीला था, जैसे शंख का रंग
होता है। यह ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे राख से लीपा हुआ गीला चौका या कोई काली सिल,
जिसे लाल केसर से धो दिया गया हो।
2. 'राख से लीपा हुआ चौका' के द्वारा कवि ने क्या कहना चाहा है?
उत्तर- कवि यह दर्शाना चाहते हैं कि भोर का आकाश पवित्र और निर्मल होता है, जैसे ताजा लीपा हुआ चौका। भोर की ओस के कारण आकाश में हल्का गीलापन भी
होता है, जो उसकी शुद्धता और ताजगी को दर्शाता है।
3. बिंब स्पष्ट करें – "बहुत काली सिला
जरा से लाल केसर से कि जैसे धुल गई हो"
उत्तर- इस पंक्ति में आकाश की तुलना उस काली सिल से की गई है, जिस पर केसर पीसने के बाद धो दिया गया हो। जिस प्रकार सिल पर केसर का
हल्का लाल रंग बचा रहता है, उसी प्रकार भोर के आकाश में उषा
की लालिमा दिखाई देती है।
4. उषा का जादू कैसा है?
उत्तर- उषा का रूप मादक और मोहक है। इसका प्रभाव इतना अद्भुत होता है कि आकाश कभी
नील शंख सा, कभी राख से लीपा चौका, तो कभी लाल केसर
से धुली काली सिल प्रतीत होता है। सूर्योदय के पूर्व यह जादू चारों ओर फैला रहता
है|
5. 'लाल केसर' और 'लाल खड़िया चॉक' किसके लिये प्रयुक्त है?
उत्तर- ‘लाल केसर’ का प्रयोग सूर्य उदय के समय आकाश की लालिमा को
दर्शाने के लिए किया गया है, जबकि ‘लाल खड़िया चॉक’ का
प्रयोग उषाकाल के दौरान आकाश में फैली हल्की लाल आभा के लिए किया गया है।
6. प्रातः नभ की तुलना बहुत नीला शंख से
क्यों की गई है?
उत्तर- प्रातःकालीन आकाश गहरे नीले रंग का होता है, जो एक साथ पूरा
दिखाई नहीं देता। यह दृश्य शंख के रंग से मेल खाता है। साथ ही, शंख ध्वनि उत्पन्न करता है, ठीक वैसे ही जैसे भोर
में पक्षियों की चहचहाहट और मंद वायु का संगीतमय वातावरण बनता है।
7. नील जल में किसकी गौर देह हिल रही है?
उत्तर- नील जल से तात्पर्य नीले आकाश से है, जिसमें उषा की
झिलमिलाती लालिमा इस प्रकार प्रतीत होती है, जैसे किसी गोरी
स्त्री की देह पानी में हल्के-हल्के हिल रही हो। यह सूर्योदय से पहले आकाश में
फैली हल्की रोशनी का सुंदर बिंब है।

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