पाठ-6
तुमुल कोलाहल कलह में
जयशंकर प्रसाद✍जयशंकर प्रसाद का परिचय
👉जन्म : 1889
(माघ शुक्ल दशमी,
संवत् 1946)
।
👉जन्म स्थान : वाराणसी, उत्तरप्रदेश
👉निधन : 15 नवंबर
1937 में
।
👉पिता : देवी प्रसाद साह
👉शिक्षा : आठवीं तक | संस्कृत, हिन्दी, फारसी, उर्दू की शिक्षा घर पर नियुक्त शिक्षकों द्वारा
👉विशेष परिस्थिति : बारह वर्ष की अवस्था में पितृविहीन,
दो वर्ष बाद माता की मृत्यु
👉कृतियाँ :
✅काव्य संकलन : झरना (1918), आँसू (1925), लहर
(1933),
✅अतुकांत रचनाएँ:महाराणा का महत्त्व, करुणालय, प्रेम पथिक ।
✅प्रबंध काव्य: कामायनी (1936)
✅नाटक : कल्याणी परिणय (1912), प्रायश्चित (1914 ), राज्यश्री (1915 ),
विशाख (1929), कामना (1927) जन्मेजय का
नागयज्ञ (1926), स्कंदगुप्त (1926), एक
घूँट (1928), चंद्रगुप्त (1931), ध्रुवस्वामिनी
(1933) ।
✅कथा संग्रह : छाया (1912),
प्रतिध्वनि (1931), इंद्रजाल (1936)
✅उपन्यास : कंकाल (1929),
तितली (1934), इरावती (अपूर्ण, 1940) 1 महाराणा का महत्त्व, करुणालय, प्रेम पथिक, कामायनी, छाया,
इंद्रजाल, कंकाल, इत्यादि
👉यह एक छायावाद के कवि हैं।
👉कामायनी कुल 15 सर्ग हैं।
तुमुल कोलाहल कलह में का भावार्थ
तुमुल कोलाहल कहल में
तुमुल कोलाहल कलह
में
मैं हृदय की बात रे
मन!
भावार्थ - प्रस्तुत
पंक्ति छायावाद के प्रमुख कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य कामायनी
के
निर्वेद
सर्ग से ली गई है। इसमें श्रद्धा
मन से कहती है कि इस अत्यधिक शोर,
कलह और अशांति के बीच भी मैं हृदय की बात के समान शांत और
गंभीर हूँ।
विकल होकर नित्य चंचल,
खोजती जब नींद के पल
चेतना थक सी रही तब,
मैं मलय की वात रे
मन !
भावार्थ - प्रस्तुत पंक्तियाँ जयशंकर प्रसाद
के महाकाव्य कामायनी के निर्वेद सर्ग से ली गई हैं, जिनमें श्रद्धा नारी के स्नेह और शांति प्रदान करने वाले स्वभाव को
दर्शाती है।
इसमें बताया गया है कि जब पुरुष दिनभर की भागदौड़ और मानसिक अशांति
के कारण थक जाता है और आराम की तलाश करता है, तब नारी का
स्नेह और सहानुभूति उसे सुकून देती है। मनुष्य का मन हमेशा चिंताओं और इच्छाओं के
कारण चंचल बना रहता है, जिससे वह मानसिक और शारीरिक रूप से
थक जाता है। ऐसी स्थिति में नारी का स्नेह, सहानुभूति और
प्रेम उसे मलय पर्वत से बहने वाली ठंडी और सुगंधित हवा की तरह शांति और ताजगी
प्रदान करता है।
कवि यहाँ नारी के ममतामयी और सहारा देने वाले स्वरूप को दर्शाते हैं
और यह बताना चाहते हैं कि जीवन की कठिनाइयों और मानसिक तनाव में नारी का प्रेम और
सहयोग पुरुष को संबल प्रदान करता है।
चिर-विषाद विलीन
मन की
इस
व्यथा के तिमिर वन की
मैं
उषा सी ज्योति रेखा,
कुसुम विकसित प्रात रे मन !
भावार्थ - प्रस्तुत
पंक्तियाँ जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य कामायनी के निर्वेद सर्ग
से ली गई हैं, जिनमें श्रद्धा नारी के महत्व को दर्शाते हुए कहती है कि वह
पुरुष के जीवन में आशा, प्रकाश और नवीन ऊर्जा का संचार करती
है।
यहाँ मनुष्य के मन को एक अंधकारमय जंगल के रूप में दर्शाया गया है,
जो विषाद (दुख) और पीड़ा से भरा हुआ है। यह अंधकार लंबे समय से मन
में छाया हुआ है, जिससे व्यक्ति को निराशा और कष्ट का अनुभव
होता है। लेकिन श्रद्धा (नारी का स्नेह और प्रेम) उस अंधकार में प्रभात की किरणों
की तरह चमकती है, जो निराशा को मिटाकर नई आशा और ऊर्जा का
संचार करती है।
कवि यह बताना चाहते हैं कि नारी पुरुष के जीवन में सकारात्मकता,
शांति और स्नेह की प्रतीक है। वह निराशा के घने अंधकार को मिटाकर,
प्रभात के खिले फूलों की तरह मन को ताजगी और उत्साह प्रदान
करती है।
जहां मरु ज्वाला
धधकती
चातकी
कन को तरसती
उन्हीं
जीवन घाटियों की
मैं
सरस बरसात रे मन!
भावार्थ - प्रस्तुत पंक्तियाँ जयशंकर प्रसाद
द्वारा रचित महाकाव्य कामायनी के निर्वेद सर्ग से ली गई हैं, जिनमें श्रद्धा नारी के महत्व को दर्शाते हुए कहती है कि वह पुरुष के जीवन
में शीतलता, स्नेह और संतोष की वर्षा के समान है।
यहाँ जीवन को एक तपते हुए मरुस्थल के रूप में प्रस्तुत किया गया है,
जहाँ दुख, संघर्ष और कष्टों की ज्वाला धधक रही
है। मनुष्य इस कठिन परिस्थिति में एक चातक पक्षी की तरह सुख और शांति की एक बूंद
के लिए तरसता है। ऐसे समय में श्रद्धा सरस (सुखद) वर्षा के समान जीवन में प्रवेश
करती है और संतोष, आनंद और शीतलता प्रदान करती है।
कवि यह बताना चाहते हैं कि नारी का स्नेह और प्रेम पुरुष के जीवन
में शीतल वर्षा की तरह सुखद एहसास लाता है, जो उसके दुखों को
हरकर शांति और ताजगी प्रदान करता है।
पवन की प्राचीर
में रुक
जला
जीवन जा रहा झुक
इस
झुलसते विश्व-वन की
मैं
कुसुम ऋतु रात रे मन !
भावार्थ - प्रस्तुत
पंक्तियाँ जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य कामायनी के निर्वेद सर्ग
से ली गई हैं, जिनमें श्रद्धा नारी के जीवन में शीतलता, संबल और आनंद देने वाले स्वरूप को दर्शाती है।
यहाँ जीवन को
एक ऐसे झुलसते हुए वन के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जहाँ
संघर्ष, पीड़ा और कष्टों की अग्नि जल रही है। मनुष्य दुनिया
की कठिनाइयों से घिरकर धीरे-धीरे थक जाता है और झुकने लगता है। जब जीवन तेज हवा की
प्राचीर (दीवार) में फंसकर थकान और निराशा महसूस करता है, तब
श्रद्धा वसंत ऋतु की शीतल और सुखद रात्रि के समान होती है।
कवि यह
कहना चाहते हैं कि जब जीवन कठिनाइयों और दुखों के कारण निर्जीव और शुष्क हो जाता
है, तब नारी का स्नेह, प्रेम और
सहानुभूति वसंत की रात की तरह उसे शीतलता और नवजीवन प्रदान करती है।
चिर निराशा नीरधर
से
प्रतिच्छायित
अश्रु सर में
मधुप
मुखर मरंद मकुलित
मैं
सजल जलजात रे मन !
भावार्थ - प्रस्तुत पंक्तियाँ जयशंकर प्रसाद
द्वारा रचित महाकाव्य कामायनी के निर्वेद सर्ग से ली गई हैं, जिनमें श्रद्धा नारी के करुणा, सांत्वना और जीवन में
मधुरता लाने वाले स्वरूप को व्यक्त करती है।
यहाँ जीवन को गहरी
निराशा और अश्रुओं से भरे एक जलाशय के रूप में दर्शाया गया है। मनुष्य का जीवन जब दुख,
विषाद और हताशा के अंधकार में डूब जाता है, तब
श्रद्धा एक कोमल और सुंदर कमल के समान होती है, जो उस
अश्रुओं से भरे जल में खिला रहता है। इस कमल के चारों ओर मधुर आवाज में गूंजते हुए
भौंरे (मधुप) घूमते रहते हैं, जो जीवन में सुख, प्रेम और मधुरता का प्रतीक हैं।
कवि
यह कहना चाहते हैं कि जब मनुष्य निराशा, दुख और आंसुओं के
सागर में डूबा होता है, तब नारी का स्नेह, सहानुभूति और प्रेम कमल की तरह उसमें खिलकर जीवन को सुंदरता और शांति
प्रदान करता है।
तुमुल कोलाहल कलह में का सारांश
यह कविता जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य कामायनी के निर्वेद
सर्ग से ली गई है। इसमें श्रद्धा, इड़ा और मनु के प्रतीकों के माध्यम
से जीवन के गहरे भावों को अभिव्यक्त किया गया है।
कथानक के अनुसार, इड़ा की प्रजा और मनु के बीच
भयंकर युद्ध होता है, जिसके बाद चारों ओर शोक और शांति छा
जाती है। मूर्छित मनु को देखकर श्रद्धा द्रवित हो उठती है और उसे स्नेह और
सांत्वना प्रदान करती है। मनु और श्रद्धा का मधुर मिलन होता है, जहाँ श्रद्धा जीवन में शांति, प्रेम और करुणा का
प्रतीक बनती है।
प्रतीकात्मक रूप से, श्रद्धा हृदय और भावनाओं का
प्रतीक है, इड़ा बुद्धि का और मनु मन का प्रतीक है। जीवन में
जब संघर्ष और अशांति बढ़ती है, तब केवल भावनाओं की कोमलता और
प्रेम की शक्ति ही वास्तविक शांति प्रदान कर सकती है। श्रद्धा नारी के स्नेह,
वात्सल्य और सहनशीलता को दर्शाती है, जो पुरुष
को विश्राम और सुकून देती है। वह मलयगिरि की शीतल हवा की तरह जीवन को शीतलता और
सांत्वना प्रदान करती है।
इस कविता का मूल संदेश यह है कि जीवन के कोलाहल और संघर्षों के बीच
हमें अपने हृदय की सच्ची भावनाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए, क्योंकि
संवेदनशीलता और प्रेम ही जीवन की वास्तविक शांति के स्रोत हैं।
TUMUL KOLAHAL KALAH ME OBJECTIVE QUESTION
1.
प्रस्तुत गीत ‘तुमुल कोलाहल कलह में’ किसने गाया है?
a)लता मंगेशकर
b) आशा भोंसले
c) सोम ठाकुर
d) नीरज
2.
‘तुमुल कोलाहल कलह में’ शीर्षक कविता के रचयिता कौन है?
a)सूर्यकांत त्रिपाठी
b)जयशंकर प्रसाद
c)महादेवी वर्मा
d)सुमित्रानंदन पंत
3.
जयशंकर प्रसाद जी किस काल के कवि हैं?
a)छायावाद
b)रीति काल
c)आदिकाल
d)इनमें से कोई नहीं
4.
इनमें कौन-सी रचना प्रसाद जी की नहीं है?
a) झरना
b) आँसू
c) देवदासी
d) कामायनी
5.
इन्दु का प्रकाशन किसने प्रारम्भ किया था?
a) अम्बिका प्रसाद
b) देवी प्रसाद
c) रहीम दास
d) सुखदेवराम
6.
प्रसाद की पहली प्रकाशित कृति कौन - सी है?
a) आँसू
b) कामायनी
c) चित्राधार
d) लहर
7.
‘कामायनी’ प्रसाद की कैसी कृति है?
a)प्रबंध काव्य
b)गद्य काव्य
c)खंड काव्य
d)नाट्य कृतियाँ
8.
‘सजल जलजात’ में कौन सा अलंकार है?
a)रूपक
b)दुपक
c)दुपक
d)इनमें से कोई नहीं
9.
जयशंकर प्रसाद का जन्म कहां हुआ था?
a)वाराणसी
b)बेगूसराय
c)इलाहाबाद
d)फर्रुखाबाद
10. जयशंकर प्रसाद के पिता
का क्या नाम था?
a)मोहन प्रसाद मिश्रा
b)देवीप्रसाद साहू
c)देवेंद्र प्रसाद
d)इनमें से कोई नहीं
11. इनमें से छायावाद की कौन
- सी विशेषता नहीं है?
a) लाक्षणिकता
b) रहस्यात्मकता
c) दार्शनिकता
d) बुद्धिवादिता
12. चेतना थक सो रही है । उस
समय श्रद्धा अपने को क्या बताती है?
a) मलय की बात
b) उत्साह की किरण
c) आत्म - वैभव का प्रतीक
d) बासन्ती झोंका
13. मनुष्य का शरीर क्यों थक
जाता है?
a)मन की चंचलता से
b)ज्यादा काम करने से
c)सोने से खाने से
d)खाने से
14. प्रसाद जी का जन्म हुआ
था
a) 1889
b) 1890
c) 1888
d) 1891
15. चातकी किस के लिए तरसती
है?
a)एक छोटी सी बूंद के लिए
b)मछली के लिए
c)पानी के लिए
d)दूध के लिए
ANSWER
1.b 2.b 3.a 4.c
5.a 6.c 7.a 8.a 9.a 10.b 11.d 12.a 13.a 14.a 15.a
TUMUL KOLAHAL KALAH ME QUESTION ANSWER
1. ह्रदय की बात का क्या कार्य है?
उत्तर - चारों ओर कोलाहल और अशांति के बीच हृदय की बात मन को शांति और संतुलन प्रदान
करती है। जब बुद्धि भ्रमित हो जाती है और निर्णय क्षमता कमजोर पड़ जाती है, तब हृदय की कोमल भावनाएँ सांत्वना देकर सही मार्ग दिखाती हैं।
2. कविता में उषा की किस भूमिका का उल्लेख है?
उत्तर - उषाकाल अंधकार का नाश कर प्रकाश और नई ऊर्जा का संचार करता है। जैसे
उषा के आगमन से पूरी सृष्टि जाग उठती है और नया जीवन प्राप्त करती है, वैसे ही आशा और विश्वास से भरा मनुष्य का हृदय भी जीवन में प्रकाश फैलाता
है।
3. चातकी किसके लिये तरसती है?
उत्तर - चातकी एक विशेष प्रकार का पक्षी है जो स्वाति नक्षत्र में गिरने वाली जल की
बूंदों का इंतजार करती है। यह पक्षी सामान्य जल नहीं पीता और केवल स्वाति
की वर्षा का जल ग्रहण करता है।
4. बरसात को 'सरस'
कहने का क्या अभिप्राय है?
उत्तर - बरसात को जीवनदायी माना गया है, क्योंकि यह प्रकृति
को हरा-भरा कर देती है, लोगों में आनंद और खुशी भर देती है।
यह किसानों के लिए वरदान होती है और जीवन में समृद्धि, उल्लास
और नवचेतना का संचार करती है।
5. 'सजल जलजात' का क्या
अर्थ है?
उत्तर - 'सजल जलजात' का अर्थ है जल से भरा हुआ
कमल। यह मानव जीवन में आशा और सुख का प्रतीक है, जो दुखों से
भरे संसार में भी मधुरता और आनंद का संचार करता है।
6. कविता का केन्द्रीय भाव क्या है? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर - संसार में कलह, छल-कपट और संघर्ष व्याप्त हैं, जिससे
मनुष्य दुखी रहता है। मन माया-मोह में उलझकर अशांत रहता है, लेकिन
इसका समाधान श्रद्धा में है, जो विश्वास, प्रेम और आत्मा की शुद्धता का प्रतीक है। श्रद्धा के मार्ग पर चलकर मानव
कल्याण प्राप्त कर सकता ह।
7. कविता में 'विषाद'
और 'व्यथा' का उल्लेख
है। यह किस कारण से है? अपनी कल्पना से उत्तर दीजिए।
उत्तर - संसार की स्थिति कोलाहल और संघर्ष से भरी हुई है, जिससे मनुष्य का मन निराशा और दुख में डूब जाता है। मनुष्य भ्रम और अशांति
में फँसकर मानसिक व्यथा का अनुभव करता है। यह पीड़ा उसे आंतरिक रूप से क्षुब्ध कर
देती है।

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