पद
तुलसीदास✍
तुलसीदास का परिचय
👉जन्म :
1543
👉निधन : 1623
👉जन्म
: स्थान राजापुर,
बाँदा,
उत्तरप्रदेश
👉मूल नाम : रामबोला
👉पिता-माता : हुलसी एवं आत्माराम दुबे ।
👉पत्नी : रत्नावली (विवाह के कुछ ही समय बाद वैराग्य
के कारण विछोह) ।
👉प्रतिपालिका दासी :
चुनियाँ,
जिसने जन्म के बाद परिवार द्वारा
परित्यक्त होने पर पालन-पोषण किया ।
👉दीक्षा गुरु :
नरहरि दास,
सूकरखेत के वासी,
गुरु ने विद्यारंभ कराया ।
👉शिक्षा गुरु : शेष सनातन, काशी के विद्वान ।
👉शिक्षा
: चारों वेद,
षड्दर्शन,
इतिहास,
पुराण,
स्मृतियाँ,
काव्य आदि की शिक्षा काशी में
पंद्रह वर्षों तक प्राप्त की ।
👉स्थाई निवास
: काशी में,।
👉तीर्थयात्राएँ: सूकरखेत, अवध, चित्रकूट, प्रयाग, मथुरा-वृंदावन, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार, बद्रीनाथ, नैमिषारण्य मिथिला,जगन्नाथपुरी, रामेश्वर आदि प्रमुख तीर्थों की यात्राएँ समय-समय पर काशीवास करते हुए ही संपन्न कीं ।
👉मित्र और स्नेही : अब्दुर्रहीम खानखाना, महाराजा मानसिंह, नाभादास, दार्शनिक मधुसूदन सरस्वती,
टोडरमल आदि ।
👉कृतियाँ : :रामलला नहछु , वैराग्य संदीपिनी, बरवै रामायण, पार्वती मंगल, जानकी मंगल, रामाज्ञाप्रश्न, दोहावली,कवितावली, गीतावली, श्रीकृष्ण गीतावली,
रामचरितमानस,
विनय पत्रिका । इनके अतिरिक्त 44
छंदोंकी हनुमान बाहुक रचना को
कवितावली का ही अंग माना जाता है। उसे स्वतंत्र करने पर कुल 13
छोटी-बड़ी कृतियाँ होती हैं। इनके
अतिरिक्त कुछ अन्य कृतियाँ भी बताई जाती हैं। कुल 12 या 13 कृतियों की प्रामाणिकता असंदिग्ध ।
👉मानस का रचना समयः रचनारंभ तिथि सं० 1631
(1574 ई०)
चैत्र शुक्ल नवमी मंगलवार रामजन्म
की तिथि पर, अयोध्यामें कवि की 31 वर्ष की अवस्था में । रचना 1633
(1576 ई०)
अगहन शुक्ल पंचमी राम सीताविवाह की
तिथि को कुल 2 वर्ष 7 माह 26 दिन में पूर्ण हुई।
तुलसीदास के पद का भावार्थ
पद-1
कबहुँक अंब अवसर पाइ।
मेरिओ सुधि द्याइबी कछु करून-कथा चलाइ।।
भावार्थ - महाकवि तुलसीदास
जी इन पंक्तियों में माता सीता से विनम्र प्रार्थना कर रहे हैं। वे कहते हैं— "हे माँ! जब भी आपको उचित अवसर मिले, तो कृपया प्रभु
श्रीराम से कोई करुणा से भरी बात करके मेरी याद दिला देना।" तुलसीदास जी यहां
भक्त और भगवान के बीच प्रेमपूर्ण संबंध को दर्शाते हैं और माता सीता से अनुरोध
करते हैं कि वे श्रीराम के सामने उनकी सिफारिश करें, ताकि
प्रभु उन पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें।
दीन, सब अंगहीन, छीन, मलीन, अघी अघाइ।
नाम लै भरै उदर एक प्रभु-दासी-दास कहाइ।।
भावार्थ - महाकवि तुलसीदास जी इन पंक्तियों
में माता सीता से प्रार्थना कर रहे हैं। वे कहते हैं— "हे माँ! प्रभु श्रीराम से कहिए कि आपकी दासी का यह दास (तुलसीदास) अत्यंत
दीन-हीन स्थिति में है। उसका शरीर कमजोर हो चुका है, अंग ठीक
से काम नहीं कर रहे, वह बेहद दुर्बल और मलिन (अस्वच्छ) है।
पापों में डूबा होने के कारण उसका हृदय भी शुद्ध नहीं रहा। बस, आपके पवित्र नाम का स्मरण करके किसी तरह अपना जीवन व्यतीत कर रहा
है।"
यहां तुलसीदास जी अपनी विनम्रता और भक्ति को प्रकट कर रहे हैं। वे स्वयं को
अत्यंत तुच्छ मानते हुए माता सीता से विनती कर रहे हैं कि वे उनकी इस दीन दशा को
प्रभु श्रीराम तक पहुँचाएं और उन पर कृपा करें।
बझिहैं 'सो
है कौन' कहिबी नाम दसा जनाइ।
सुनत रामकृपालु के मेरी बिगारिऔ बनि जाइ।।
भावार्थ - महाकवि तुलसीदास जी इन पंक्तियों
में माता सीता से प्रार्थना कर रहे हैं। वे कहते हैं— "हे माँ! जब आप मेरी बात प्रभु श्रीराम से करेंगी, तो
वे अवश्य पूछेंगे कि यह कौन है? तब कृपया आप उन्हें मेरा नाम
और मेरी दीन-हीन दशा बता दीजिए। क्योंकि जैसे ही कृपालु श्रीराम मेरे हालात
सुनेंगे, तो उनकी करुणा उमड़ पड़ेगी और मेरी सारी बिगड़ी हुई
परिस्थितियाँ स्वयं ही सुधर जाएंगी।"
इस पंक्ति में तुलसीदास जी श्रीराम की अनंत कृपा पर विश्वास प्रकट कर रहे हैं।
वे जानते हैं कि भगवान श्रीराम करुणा के सागर हैं, और अगर वे
किसी की कठिनाई सुन लेंगे, तो उसे अवश्य ही दूर करेंगे।
जानकी जगजननि जन की किए बचन-सहाइ।
तरै तुलसीदास भव तव-नाथ-गुन-गन गाइ।।
भावार्थ - महाकवि तुलसीदास जी इन पंक्तियों
में माता सीता से प्रार्थना कर रहे हैं। वे कहते हैं— "हे माता जानकी! आप संपूर्ण जगत की जननी हैं। अब केवल आपके कहे हुए वचन ही
मेरी सहायता कर सकते हैं। कृपया मेरी मदद कीजिए, माँ! यदि आप
कृपा करेंगी तो मैं इस संसार रूपी भवसागर को पार कर जाऊँगा और सदा आपके प्रभु
श्रीराम के गुणों का गान करता रहूँगा।"
इस पंक्ति में तुलसीदास जी माता सीता की कृपा को ही अपनी मुक्ति का मार्ग मानते
हैं। वे विश्वास प्रकट कर रहे हैं कि यदि माता जानकी उनकी सिफारिश श्रीराम से कर
दें, तो वे भवसागर से पार हो सकते हैं और सदैव प्रभु के
गुणों का गुणगान करते रहेंगे।
पद-2
दवार हौं भोर ही को आजु ।
रटत रिरिहा आरि और न, कौर ही तें काजु।।
भावार्थ - महाकवि तुलसीदास
जी इन पंक्तियों में अपनी दीन-हीन अवस्था का वर्णन करते हुए प्रभु से विनम्र
प्रार्थना कर रहे हैं। वे कहते हैं— "हे प्रभु!
मैं सुबह से ही आपके द्वार पर बैठा हुआ हूँ, एक असहाय याचक
की तरह आपकी कृपा की भीख माँग रहा हूँ। मेरा और कोई सहारा नहीं है, न ही मैं किसी और की ओर देख रहा हूँ। मुझे आपसे कुछ बड़ा नहीं चाहिए— बस
आपकी कृपा का एक कौर (छोटा-सा अंश) ही पर्याप्त है, जिससे
मेरा जीवन संवर जाए।"
इस पंक्ति में तुलसीदास जी अपनी गहरी भक्ति और समर्पण भाव को प्रकट कर रहे हैं। वे
श्रीराम के अतिरिक्त किसी अन्य से कोई आशा नहीं रखते और प्रभु की कृपा मात्र को ही
अपने उद्धार का एकमात्र साधन मानते हैं।
कलि कराल दुकाल दारुन, सब कुभांति कुसाजु।
नीच जन, मन ऊंच, जैसी
कोढ़ में की खाजु।।
भावार्थ - महाकवि
तुलसीदास जी इन पंक्तियों में कलियुग की भयावह स्थिति का वर्णन करते हुए प्रभु से
अपनी दयनीय दशा पर कृपा करने की प्रार्थना कर रहे हैं। वे कहते हैं— "हे प्रभु! यह कलियुग अत्यंत भयानक और दुखों से भरा हुआ है। चारों ओर अधर्म,
अन्याय और अव्यवस्था फैली हुई है। अच्छे कर्मों और मोक्ष का मार्ग
भी पापों से भर गया है। इस युग में हर चीज अस्त-व्यस्त और अनुचित हो गई है।
मैं स्वयं भी एक अत्यंत तुच्छ और नीच प्राणी हूँ, परंतु मेरे
मन में ऊँची-ऊँची इच्छाएँ उत्पन्न होती रहती हैं। यह स्थिति ठीक वैसे ही दुखदायी
है जैसे कोढ़ के रोगी को यदि खाज (खुजली) हो जाए तो उसका कष्ट और भी बढ़ जाता
है।"
तुलसीदास जी यहाँ अपनी दीनता और इस युग की भयावहता को प्रकट कर रहे हैं। वे यह
स्वीकार कर रहे हैं कि उनका मन व्यर्थ की ऊँची अभिलाषाओं में उलझा हुआ है, जो उनके लिए और अधिक दुखदायी हो गया है। इसलिए वे प्रभु से प्रार्थना कर
रहे हैं कि वे उन पर कृपा करें और उन्हें इस दुख से मुक्त करें।
हहरि हिय में सदय बूझयो जाइ
साधु-समाजु।
मोहुसे कहुँ कतहुँ कोउ, तिन्ह कहयो कोसलराजु।।
भावार्थ - महाकवि तुलसीदास जी इन पंक्तियों
में अपनी दीन-हीन अवस्था का वर्णन करते हुए कहते हैं— "हे प्रभु! मैंने अत्यंत व्याकुल और दुखी हृदय से करुणामय संतों से जाकर
पूछा कि क्या मेरे जैसे पापी, दरिद्र और पतित व्यक्ति के लिए
भी कहीं कोई शरण है? क्या ऐसा कोई है जो मेरी रक्षा कर सकता
है?"
तब उन दयालु संतों ने उत्तर दिया— "हाँ, तुम्हारे उद्धार का एकमात्र सहारा हैं स्वयं श्रीराम, जो कोसल राज्य के स्वामी और करुणा के सागर हैं।"
इस पंक्ति में तुलसीदास जी यह प्रकट कर रहे हैं कि जब उन्होंने अपने उद्धार का
मार्ग ढूँढने के लिए साधु-संतों से पूछा, तो उन्होंने
श्रीराम का नाम बताया। इसका अर्थ यह है कि संतों के बताए मार्ग पर चलकर ही मनुष्य
कल्याण और मुक्ति प्राप्त कर सकता है, और प्रभु श्रीराम ही
सबसे बड़े आश्रयदाता हैं।
दीनता-दारिद दलै को कृपाबारिधि
बाज।
दानि दसरथरायके, तू बानइत सिरताजु।।
भावार्थ - महाकवि तुलसीदास जी इन पंक्तियों में
प्रभु श्रीराम की करुणा और कृपा की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं— "हे कृपा के सागर! इस संसार में मेरे जैसी दीनता और दरिद्रता को दूर करने
वाला आपके अलावा और कौन हो सकता है? मेरी इस दीन-हीन दशा का
नाश केवल आपकी कृपा से ही संभव है।
हे दशरथ पुत्र श्रीराम! आप सबसे बड़े दानी हैं, और आपके
द्वारा ही मेरी बिगड़ी हुई स्थिति सुधर सकती है। आपके बिना मेरा कोई और सहारा नहीं
है।"
इस पंक्ति में तुलसीदास जी पूर्ण समर्पण भाव से श्रीराम को पुकार रहे हैं और यह
स्वीकार कर रहे हैं कि उनकी कृपा के बिना वे इस संसार के दुखों से मुक्त नहीं हो
सकते।
जनमको भूखो भिखारी हौं गरीबनिवाजु।
पेट भरि तलसिहि जेंवाइय भगति-सुधा सुनाजु।।
भावार्थ - महाकवि तुलसीदास जी इन पंक्तियों
में अपनी दीनता व्यक्त करते हुए प्रभु श्रीराम से विनम्र प्रार्थना कर रहे हैं। वे
कहते हैं— "हे कृपा के सागर! हे गरीबों के नाथ! मैं जन्म से ही एक
भूखा भिखारी हूँ, जो आपकी भक्ति का प्यासा है। मेरा मन सदैव
आध्यात्मिक तृप्ति की खोज में भटकता रहता है।"
हे प्रभु! तुलसीदास जैसा भूखा भक्त आपके द्वार पर बैठा है, कृपया
मुझे अपनी भक्ति रूपी अमृत पिला दें ताकि मेरी ज्ञान और आत्मिक तृष्णा शांत हो
सके।"
इस पंक्ति में तुलसीदास जी भक्ति की महिमा को दर्शा रहे हैं। वे श्रीराम से निवेदन
कर रहे हैं कि जिस प्रकार अन्न से शारीरिक भूख मिटती है, उसी
प्रकार उनके मन की आध्यात्मिक प्यास को प्रभु की भक्ति रूपी अमृत से तृप्त किया
जाए।
TULSIDAS KE PAD OBJECTIVE QUESTION
1.
इनमें से तुलसीदास की कौन सी रचना है?
a)पद
b)कड़बक
c)छप्पय
d)हार-जीत
2.
तुलसीदास को किस वास्तु की भूख है?
a)खाने की
b)सोने की
d)पढने की
d)भक्ति की
3.
तुलसी का जन्म कब माना जाता है?
a) 1543
b) 1544
c) 1546
d) 15482
4.
तुलसी दास के पठित पद किस भाषा में है?
a)हिंदी
b)उर्दू
c)अवधी
d)ब्रज
5.
तुलसी का बचपन का नाम क्या था?
a) रामबोला
b) श्याम बलि
c) हरिबोला
d) शिवबोला
6.
तुलसीदास किस शाखा के कवि है?
a)कृष्णभक्ति धरा
b)राममार्गी
c)प्रेममार्गी
d)इनमे से कोइन्हीं
7.
सूकर क्षेत्र के वासी कौन थे?
a) श्री हरिदास
b) जानकीदास
c) प्रहलाद दास
d) नरहरिदास
8.
तुलसी के शिक्षा गुरु कौन थे?
a)शेष सनातन जी
b)विद्यापति जी
c)शेषनाथ जी
d)कलानाथ जी
9.
दुसरे पद में तुलसी ने अपना परिचय किस रूप में दिया है?
a)महँ शिक्षक के रूप
b)भिखारी के रूप में
c)पुजारी के रूप में
d)इनमे से कोई नहीं
10. इनमें से कौन - सी
पुस्तक तुलसी की नहीं है?
a) रामलला नहछू
b) बरबै रामायण
c) जानकी मंगल
d) हनुमान मंगल
11. गोस्वामी जी किस
काव्यधारा के कवि थे?
a) कृष्ण काव्यधारा
b) रीति काव्यधारा
c) भक्ति काव्यधारा
d)राम काव्यधरा
12. काशी में कितने वर्ष
रहकर तुलसीदास विद्याध्ययन किए ?
a)15
b)10
c)18
d)20
13. कवि तुलसीदास माता सीता
से क्या अनुरोध कर रहे हैं?
a) उन्हें दर्शन देने का
b) प्रभु श्रीराम को उनकी याद दिलाने
का
c) उन्हें धन-संपत्ति देने का
d) उन्हें मोक्ष देने क
14. “कबहुँक अंब अवसर पाइ।
मेरिओ सुधि द्याइबी कछु करून-कथा चलाइ।।“ तुलसीदास
जी इन पंक्तियों में किससे प्रार्थना कर रहे हैं?
a) श्रीराम से
b) माता सीता से
c) हनुमान जी से
d) लक्ष्मण जी से
15. दीन, सब
अंगहीन, छीन, मलीन, अघी
अघाइ। नाम लै भरै उदर एक प्रभु-दासी-दास कहाइ।। कवि तुलसीदास इस
पंक्ति अपनी किस स्थिति का वर्णन कर रहे हैं?
a) संपन्नता और वैभव का
b) दीनता और असहायता का
c) युद्ध में विजय प्राप्त करने का
d) आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने
16. तुलसीदास को विश्वास है कि श्रीराम उनकी दशा सुनकर
क्या करेंगे?
a) उन्हें दंड देंगे
b) उनकी बिगड़ी हुई स्थिति सुधार देंगे
c) उन्हें भूल जाएंगे
d) उन्हें कोई वरदान देंगे
17. तुलसीदास जी प्रभु के द्वार पर किस समय से बैठे हुए हैं?
a) दोपहर से
b) रात्रि से
c) भोर (सुबह) से
d) संध्या के समय
18. तुलसीदास प्रभु से क्या माँग रहे हैं?
a) उनकी कृपा का एक कौर (थोड़ा-सा अंश)
b) राज्य और वैभव
c) मोक्ष प्राप्ति का वरदान
d) लंबी आयु
ANSWER
1.a 2.d 3.a 4.c
5.a 6.b 7.d 8.a 9.b 10.d 11.d 12.a 13.b 14.b 15.b 16.b 17.c 18.a
TULSIDAS PAD QUESTION ANSWER
1.
'कबहुँक
अंब अवसर पाई' में 'अंब' का संबोधन किसके लिए है? इसका मर्म स्पष्ट करें।
उत्तर: 'अंब' का संबोधन माता
सीता के लिए है। तुलसीदास उनसे प्रार्थना करते हैं कि यदि कभी अवसर मिले, तो वे प्रभु श्रीराम को उनकी याद दिलाएँ और उनके लिए कृपा की सिफारिश
करें।
2.
प्रथम
पद में तुलसीदास ने अपना परिचय कैसे दिया है?
उत्तर: तुलसीदास स्वयं को दीन-हीन, पापी और कमजोर बताते हैं। वे श्रीराम
का नाम लेकर जीवन व्यतीत कर रहे हैं और चाहते हैं कि उनकी यह दयनीय स्थिति प्रभु
तक पहुँचे।
3.
तुलसी
सीता से कैसी सहायता माँगते हैं?
उत्तर: वे माता सीता से निवेदन करते हैं कि जब श्रीराम प्रसन्न और अकेले हों, तभी उनकी ओर से सिफारिश करें। यदि प्रभु पूछें, "यह कौन है?", तो उन्हें दीन-हीन भक्त बताकर
उनकी याद दिलाएँ।
4.
तुलसी
सीधे राम से क्यों नहीं कहते?
उत्तर: तुलसी को डर है कि उनके पापी आचरण पर श्रीराम नाराज हो सकते हैं। माता का
हृदय कोमल और दयालु होता है। साथ ही, श्रीराम अपनी
प्रिय पत्नी की सिफारिश को अनदेखा नहीं करेंगे।
Bihar Board Class 12 Hindi Notes
5.
तुलसी
को भरोसा क्यों है कि उनकी बिगड़ी बात बन जाएगी?
उत्तर: तुलसी मानते हैं कि वे अत्यंत दीन-हीन हैं, लेकिन श्रीराम
स्वभाव से कृपालु हैं। वे हमेशा दीनों पर विशेष कृपा करते हैं, इसलिए उन पर भी अवश्य कृपा करेंगे।
6.
दूसरे
पद में तुलसी ने अपना परिचय कैसे दिया है?
उत्तर: वे स्वयं को अधम और बड़बोला बताते हैं, जो बिना किसी
योग्यता के बड़ी-बड़ी बातें करता है। वे अपनी तुलना "कोढ़ में खाज" से करते हैं, जिससे उनका दीनभाव स्पष्ट होता है।
7.
दोनों
पदों में कौन-सा रस व्यक्त हुआ है?
उत्तर: इन पदों में भक्ति रस व्यक्त हुआ है। तुलसीदास ने श्रीराम और माता
सीता की स्तुति करते हुए अपने भक्तिभाव को अभिव्यक्त किया है।
8.
तुलसी
के हृदय में किस बात का डर है?
उत्तर: तुलसी को अपनी अयोग्यता और उद्यमहीनता का डर है। उन्हें लगता है कि वे कुछ भी
पाने के योग्य नहीं हैं और बिना किसी कर्म के भगवान की कृपा माँग रहे हैं।
9.
राम
का स्वभाव कैसा है?
उत्तर: राम अत्यंत कृपालु और दीन-दुखियों पर विशेष दया करने वाले हैं। संत समाज भी
यही कहता है कि वे ही ऐसे भगवान हैं, जो सबसे अधिक
उद्यमहीन और असहाय व्यक्ति को भी शरण देते हैं
10. तुलसी को किस वस्तु की भूख है?
उत्तर: तुलसी को सांसारिक सुखों की भूख नहीं है, बल्कि वे भक्ति
रूपी अमृत चाहते हैं। वे प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि उन्हें अपने चरणों
में स्थान देकर कलियुग के प्रभाव से बचाएँ।
11. 'रटत रिरिहा आरि और न, कौर
ही तें काजु।' यहाँ 'और' का क्या अर्थ है?
उत्तर: यहाँ "और" का अर्थ है "बस इतना ही"। तुलसी रो-रोकर विनती कर रहे हैं
कि उन्हें बहुत कुछ नहीं चाहिए, केवल प्रभु कृपा का एक छोटा-सा अंश
ही पर्याप्त है।
12. तुलसी ने 'दीनता'
और 'दारिद्रता' दोनों का
प्रयोग क्यों किया है?
उत्तर: 'दीनता' का अर्थ असहाय
स्थिति और 'दारिद्रता' का अर्थ
गरीबी है। तुलसी का समय कठिनाइयों से भरा था, इसलिए वे भगवान
से दोनों से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना करते हैं।

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