पाठ-1
संक्षेपण
संक्षेपण उस प्रक्रिया को कहते हैं
जिसमें किसी विस्तृत विवरण, पाठ या जानकारी को उसके मूल अर्थ को बनाए रखते हुए
संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसमें अनावश्यक विवरणों को हटाकर केवल
आवश्यक व मुख्य बिंदुओं को संक्षेप में लिखा जाता है,
जिससे पाठ छोटा,
स्पष्ट और प्रभावी बन जाता है।
संक्षेपण की प्रक्रिया
Step 1
पैसेज को ध्यान से पढ़ें। जरूरत पड़ने पर इसे एक से अधिक
बार पढ़ें। लेखक का पहला काम है कि वह पाठ को इतनी अच्छी तरह समझे कि उसके मुख्य
विचार या केंद्रीय विचार को निकाल सके।
Step 2
यह तय करें कि पाठ में कौन से तथ्य या विचार आवश्यक हैं और
कौन से गौण या महत्वपूर्ण नहीं हैं। महत्वपूर्ण शब्दों और विचारों (ideas) को underline करना एक अच्छा तरीका है।
Step 3
संक्षेपण के लिए एक उपयुक्त शीर्षक (Suitable title)
चुनें।
Step 4
सभी मुख्य बिंदुओं को एकत्र करें
और संक्षेप का पहला मसौदा
(draft) तैयार करें, ध्यान रखें कि मूल पाठ को एक तिहाई
लंबाई तक कम करना है। पैसेज में व्यक्त मुख्य विचार,
इसमें शामिल विचार, प्रस्तुत राय और निष्कर्ष को संक्षेप के प्रारंभिक मसौदे
में शामिल करें।
Step 5
मसौदा पढ़ें। ऐसा हो सकता है कि यह
बहुत लंबा हो। यदि आवश्यक हो तो इसे और छोटा करें, ऐसा कुछ हटा कर जो केंद्रीय विचार के लिए आवश्यक न हो, या वाक्यों को पुनः तैयार करके। (आमतौर पर, आप दूसरे मसौदे में एक अच्छा संक्षेप तैयार कर सकते हैं।)
Step 6
जब आपने अपना
दूसरा (या अंतिम) मसौदा तैयार कर लिया हो, तो अपने संक्षेप की सावधानीपूर्वक
समीक्षा करें ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि इसमें पैसेज के विचार को व्यक्त करने के
लिए केवल आवश्यक शब्द हैं। यह जांचें कि संक्षेप लेखक के शब्दों में लिखा गया है, न कि मूल लेखक के शब्दों में|
याद रखने योग्य बातें
Ø
संक्षेप की लंबाई मूल पैसेज की
एक-तिहाई से अधिक नहीं होनी चाहिए।
Ø
केंद्रीय विचार की पहचान करें और
अनावश्यक विवरणों को हटा दें।
Ø
संक्षेप में शब्दों को संक्षिप्त
और स्पष्ट रखें।
Ø
अनावश्यक पुनरावृत्ति (repetition) से
बचें।
Ø
हर संक्षेप का एक छोटा और उपयुक्त
शीर्षक होना चाहिए।
Ø
इसे संक्षेप लेखक के शब्दों में
लिखा जाना चाहिए।
Ø
मूल पाठ के मुख्य विचारों को उसी
क्रम में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
Ø
संक्षेप में अपने विचारों को शामिल
न करें।
Ø
लेखक के विचारों की आलोचना न करें
या उन्हें न बदलें।
Ø
संक्षेप लिखते समय हमेशा तीसरे
व्यक्ति, अप्रत्यक्ष वाक्य और भूतकाल का प्रयोग करें। केवल
सार्वभौमिक सत्य को वर्तमान काल में लिखें।
उदहारण
मेरे नौजवान दोस्तों, बलवान बनो।
तुम्हारे लिए मेरी यही सलाह है। तुम भगवद्गीता के स्वाध्याय की अपेक्षा फुटबॉल
खेलकर कहीं अधिक सुगमता से मुक्ति प्राप्त कर सकते हो। जब तुम्हारी रगें और पुट्ठे
अधिक दृढ़ होंगे तो तुम भगवद्गीता के उपदेशों पर अधिक अच्छी तरह चल सकते हो। गीता
का उपदेश कायरों को नहीं दिया गया था बल्कि अर्जुन को दिया गया था, जो बड़ा शूरवीर, पराक्रमी और क्षत्रिय शिरोमणि था।
कृष्ण भगवान के उपदेश और अलौकिक शक्ति को तुम तभी समझ सकोगे जब तुम्हारी रगों में
खून कुछ और तेजी से दौड़ेगा।"
संक्षेपण:
शीर्षक: नौजवानों के लिए बलवान बनना आवश्यक
संक्षेपीकरण : नौजवानों को पहले बलवान
बनना चाहिए। फुटबॉल खेलने से वे अधिक आसानी से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। गीता
का उपदेश कायरों के लिए नहीं, बल्कि वीरों के लिए था। बलवान
बनने पर ही वे इसके उपदेशों को अच्छी तरह समझ सकते हैं।
मूल शब्द: 96
संक्षेपित शब्द: 27
इन सब के पीछे राजनीति है। यह कोई
नई बात नहीं है। नालंदा विश्वविद्यालय की कई महिमा रही है। शिक्षा के क्षेत्र में
बड़ा दबदबा रहा है नालंदा का। दस हजार विद्यार्थी और पन्द्रह सौ आचार्य थे। बौद्ध दर्शन, दर्शन, इतिहास, निरुक्त, वेद, हेतुविद्या, न्याय शास्त्र, व्याकरण,
चिकित्सा शास्त्र, ज्योतिष आदि के शिक्षण की
व्यवस्था। इस विश्वविद्यालय में। आचार्य शीलभद्र, नागार्जुन,
आचार्य धर्म कीर्ति, आचार्य ज्ञानश्री,
आचार्य बुद्ध भद्र, आचार्य गुणपति, आचार्य स्थिरमति, आचार्य सागरमति जैसे विख्यात
आचार्यों का नाम नालंदा से जुड़ा रहा। लेकिन नालन्दा के इतिहास में काला धब्बा भी
लग गया है। यह काला धब्बा नालंदा के पुस्तकालय को लेकर है। बख्तियार खिलजी के
आक्रमणों से देश की जो सबसे बड़ी हानि हई, वह थी वहाँ के इन
पुस्तकालयों को आग के हवाले करना। इस अग्निकाण्ड में वे अमूल्य ग्रन्थ सदा के लिए
भस्म हो गए। जिनका उल्लेख मात्र तिब्बती और चीनी ग्रंथों में मिलता है। युवानच्चाङ
ने नालंदा के पुस्तकालय का बड़ा गौरवपूर्ण उल्लेख किया है। तिब्बती विवरणों से पता
चलता है कि नालंदा में पुस्तकालयों का एक विशिष्ट क्षेत्र था। उसे वह ‘धर्मगंज’
कहते थे। इसमें ‘रत्नसागर’, ‘रत्नोदधि’ और रत्नंजक नामक तीन
विशाल पुस्तकालय थे। ‘रत्नसागर’ का भवन नौ-मंजिला था।
संक्षेपण:
शीर्षक: नालंदा विश्वविद्यालय का गौरव और विध्वंस
संक्षेपीकरण : नालंदा विश्वविद्यालय
शिक्षा का एक महान केंद्र था, जहाँ दस हजार विद्यार्थी और
पंद्रह सौ आचार्य थे। इसमें दर्शन, चिकित्सा, न्यायशास्त्र आदि की पढ़ाई होती थी। यह आचार्य शीलभद्र, नागार्जुन जैसे विद्वानों से जुड़ा था। लेकिन बख्तियार खिलजी के आक्रमण
में इसके प्रसिद्ध पुस्तकालय नष्ट कर दिए गए, जिससे कई
अमूल्य ग्रंथ सदा के लिए खो गए। तिब्बती और चीनी ग्रंथों में ही उनका उल्लेख मिलता
है।
मूल शब्द: 145
संक्षेपित शब्द: 43
अनुशासन की आवश्यकता छात्र-जीवन के
लिए सबसे अधिक है। छात्र विवेकसंगत श्रृंखला में रहने की आदत डालें। उनकी क्षमता
बिखर कर नष्ट न होने पाए। इसके लिए छात्रों को व्यावहारिक जीवन में अनुशासन के
नियमों का पालन करना परमावश्यक है। जीवन के हर क्षेत्र में अनुशासन की आवश्यकता
पड़ती है। केवल विद्यालय में नहीं, वरन् परिवार एवं
समाज में भी अनुशासन के नियमों का पालन करना परमावश्यक है। जीवन के हर क्षेत्र में
अनुशासन की आवश्यकता पड़ती है। पूरी सृष्टि और पूरा ब्रह्माण्ड भी अनुशासन में
बँधा है। जीवन में अनुशासन न हो तो हम आसानी से अराजकता के शिकार हो जायेंगे।
संक्षेपण:
शीर्षक: अनुशासन का महत्व
संक्षेपीकरण : अनुशासन छात्र-जीवन और
व्यावहारिक जीवन के लिए अनिवार्य है। यह न केवल विद्यालय, बल्कि
परिवार और समाज में भी आवश्यक है। अनुशासन के बिना जीवन अराजक हो सकता है। पूरी
सृष्टि और ब्रह्मांड भी अनुशासन में बँधे हैं।
मूल शब्द:
92
संक्षेपित शब्द: 31
किसी राष्ट्र या जाति में संजीवनी
भरने वाला साहित्य ही है। इसलिए साहित्य सर्वतोभावेन संरक्षणीय है। सब कुछ खोकर भी
यदि हम उसे बचाये रखेंगे, तो फिर इसके द्वारा हम सब कुछ पा भी सकते हैं। इसे खोकर यदि
बहुत कुछ पा भी लेंगे, फिर इसे कभी पा न सकेंगे। कारण,
यह हमारे पूर्वजों की कमाई है। किसी जाति के पूर्वजों का चिरसंचित
ज्ञान-वैभव ही साहित्य है।
संक्षेपण:
शीर्षक: साहित्य का महत्व
संक्षेपीकरण : साहित्य किसी राष्ट्र या जाति के लिए संजीवनी समान है, इसलिए इसका संरक्षण आवश्यक है। यह पूर्वजों की अमूल्य विरासत है, जिसे खोने पर पुनः प्राप्त नहीं किया जा सकता।
मूल शब्द: 66
संक्षेपित शब्द:
26
प्रत्येक मनुष्य के जीवन में
उद्देश्य होना चाहिए। यदि तुम्हारा कोई उद्देश्य नहीं है तो तुम सफल ना होगे। इसको
तुम्हें जानना आवश्यक है। उद्देश्यहीन मनुष्य बिना पतवार की नाव की तरह है।
विभिन्न मनुष्यों के विभिन्न उद्देश्य होते हैं। बहुत लोग धन कमाना चाहते हैं और
धन कमाना ही उनका उद्देश्य बन जाता है। कुछ लोग केवल आनंद उठाना चाहते हैं, कुछ लोग विद्या के लिए परेशान हैं। कुछ लोग सिर्फ बढ़ाई चाहते हैं।
तुम्हारा उद्देश्य देश की सेवा करना होना चाहिए। तुम्हारा देश दरिद्र है। यहाँ
किसान सच्चे, सरल और पवित्र हैं। वे भूमि को अच्छी बनाकर
अपनी मेहनत की अच्छी मजदूरी नहीं निकाल सकते। तुम उन्हें योग्य और सफल किसान बनाने
का उद्योग कर सकते हो।"
संक्षेपण:
शीर्षक: उद्देश्य का महत्व
संक्षेपीकरण : प्रत्येक मनुष्य के जीवन में कोई उद्देश्य होना चाहिए, अन्यथा वह बिना पतवार की नाव की तरह होगा। लोग धन, विद्या
या प्रसिद्धि चाहते हैं, परंतु श्रेष्ठ उद्देश्य देश की सेवा
है। किसानों को योग्य और सफल बनाना भी एक महान उद्देश्य हो सकता है।
मूल शब्द: 107
संक्षेपित शब्द: 35
हिन्दू-मुसलमान-सिक्ख सभी धर्मों में एक ही प्रकार की उदारता है तो फिर मनुष्य
धर्म के नाम पर इतना उन्मत्त क्यों हो गया है? असल बात यह है कि
इन झगड़ों का कारण धर्म नहीं है, इनके मूल में स्वार्थ है।
स्वार्थ-साधनों के कारण ही यह सब दंगा-फसाद है। निकृष्ट स्वार्थ-साधन धर्म का अपने
ही स्वार्थ के लिए व्यवहार करते हैं। इन्हीं स्वार्थ-साधनों के कारण आज हिन्दुत्व
भी विपन्न हो रहा है, इस्लाम भी नष्ट हो रहा है और सिक्ख
धर्म भी आहत हो रहा है। ऐसे ही हिन्कर्मा व्यक्तियों ने प्राचीन काल में धर्म के
नाम पर ईसा मसीह को फाँसी पर लटकाया था।
संक्षेपण:
शीर्षक: धार्मिक उन्माद और स्वार्थ
संक्षेपीकरण : सभी धर्मों में समान उदारता होते हुए भी धर्म के नाम पर हिंसा का कारण
स्वार्थ है। स्वार्थी लोग धर्म का दुरुपयोग कर दंगा-फसाद कराते हैं, जिससे सभी धर्मों को हानि होती है। प्राचीन काल में भी इसी स्वार्थ ने ईसा
मसीह को फाँसी दिलवाई थी।
मूल शब्द: 91
संक्षिप्त शब्द: 33
हमारे देश में, जो हाल हाल तक गुलाम बना रहा, नागरिक स्वतंत्रता का
मूल्य समझना जरा कठिन है। अभी हमारे देश की जनता का ध्यान रोटी, कपड़ा, मकान और रोजगार की ओर गया है। प्रायः लोग यह
कहते सुनाई देते हैं कि हमें इससे मतलब नहीं कि इस देश में किसका शासन है, जनतंत्र है या तानाशाही, हमें तो रोटी चाहिए,
रोजगार चाहिए, दवा चाहिए। इन आवश्यकताओं को
कोई भी पूरा कर दे। जनता की यह मानसिक स्थिति ठीक नहीं। यदि जनता की सूझ-बूझ ऐसी
ही रही, तो फिर स्वतंत्रता, जो असीम
बलिदान देकर प्राप्त की गई है, मिट जाएगी।
संक्षेपण:
शीर्षक: स्वतंत्रता का महत्व
संक्षेपीकरण : गुलामी झेल चुके देश में नागरिक स्वतंत्रता का मूल्य समझना कठिन है। जनता
केवल रोटी, कपड़ा और रोजगार पर ध्यान दे रही है और शासन
प्रणाली से अनभिज्ञ है। यह स्थिति ठीक नहीं, क्योंकि यदि ऐसा
चलता रहा तो बलिदानों से मिली स्वतंत्रता नष्ट हो सकती है।
मूल शब्द: 95
संक्षिप्त शब्द: 34
परिश्रम
का महत्व जीवन में अत्यधिक है। यह वह सीढ़ी है, जिससे व्यक्ति सफलता के शिखर तक पहुँच सकता है। संसार
में जितने भी महान व्यक्ति हुए हैं, वे सभी कठोर परिश्रमी थे। बिना परिश्रम के कोई भी
सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। जो व्यक्ति आलस्य में अपना समय नष्ट करता है,
वह जीवन में कभी उन्नति नहीं कर
सकता। परिश्रमी व्यक्ति कठिनाइयों से घबराते नहीं, बल्कि उनका सामना कर आगे बढ़ते हैं। हमें अपने जीवन
में परिश्रम को अपनाना चाहिए, तभी हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं।"
संक्षेपण:
शीर्षक: परिश्रम का
महत्व
संक्षेपीकरण : परिश्रम सफलता की कुंजी है। बिना परिश्रम के कोई
उन्नति नहीं कर सकता। आलसी व्यक्ति जीवन में पीछे रह जाता है,
जबकि परिश्रमी कठिनाइयों का सामना
कर आगे बढ़ते हैं। हमें परिश्रम को अपनाना चाहिए।
मूल शब्द: 95
संक्षेपण शब्द: 32
समय
सबसे मूल्यवान धन है। इसे नष्ट करने वाला व्यक्ति जीवन में कभी सफल नहीं हो सकता।
समय किसी के लिए नहीं रुकता और एक बार बीत जाने पर वापस नहीं आता। जो व्यक्ति समय
का सदुपयोग करता है, वह
जीवन में उन्नति करता है। इतिहास गवाह है कि जिन्होंने समय की कद्र की,
वे महान बने,
और जिन्होंने इसे व्यर्थ गंवाया,
वे पछताते रह गए। विद्यार्थी जीवन
में समय का विशेष महत्व होता है। परीक्षा के समय यदि कोई विद्यार्थी समय का सही
उपयोग न करे, तो
उसे असफलता का सामना करना पड़ता है। इसलिए हमें समय का सदुपयोग करना चाहिए और इसे
व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए।
संक्षेपण:
शीर्षक: समय का महत्व
संक्षेपीकरण : समय सबसे मूल्यवान
धन है। इसे व्यर्थ गंवाने वाला असफल रहता है। जो व्यक्ति समय का सदुपयोग करता है, वह उन्नति करता है। विद्यार्थी जीवन में समय का सही उपयोग अनिवार्य है।
मूल शब्द: 110
संक्षेपण शब्द: 36
अभ्यास
1.
स्वच्छता का हमारे जीवन में बहुत महत्व है। स्वच्छता न केवल
हमें बीमारियों से बचाती है, बल्कि यह हमारे समाज को भी सुंदर और विकसित बनाती है। गंदगी
अनेक बीमारियों का कारण बनती है, जिससे व्यक्ति का जीवन कष्टमय हो सकता है। यदि हम अपने घर,
आसपास और समाज को स्वच्छ रखेंगे,
तो हम स्वस्थ और प्रसन्नचित्त
रहेंगे। स्वच्छता केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के विकास के लिए भी आवश्यक है।
हमें अपने जीवन में स्वच्छता को अपनाना चाहिए और दूसरों को भी इसके प्रति जागरूक
करना चाहिए।
2.
ईमानदारी मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है। ईमानदार व्यक्ति को
समाज में सम्मान और विश्वास मिलता है। बेईमानी से व्यक्ति
कुछ समय के लिए सफलता प्राप्त कर सकता है,
लेकिन यह स्थायी नहीं होती। सच्चा
सुख और संतोष केवल ईमानदारी से ही प्राप्त किया जा सकता है। ईमानदार व्यक्ति
आत्मविश्वास से भरपूर होता है और हर कठिनाई का सामना दृढ़ता से कर सकता है। इसलिए
हमें अपने जीवन में ईमानदारी को अपनाना चाहिए और सदैव सत्य के मार्ग पर चलना
चाहिए।
3.
स्वास्थ्य हमारे जीवन का सबसे बड़ा धन है। यदि व्यक्ति
स्वस्थ नहीं रहेगा, तो
वह जीवन के किसी भी सुख का आनंद नहीं ले सकता। अस्वस्थता जीवन को निराशाजनक बना
देती है। अच्छा स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए संतुलित आहार,
नियमित व्यायाम और स्वच्छता आवश्यक
हैं। स्वस्थ व्यक्ति ही अपने कर्तव्यों का सही ढंग से पालन कर सकता है। हमें अपने
स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना चाहिए और नियमित रूप से अपने शरीर की देखभाल करनी
चाहिए।
4.
आत्मनिर्भरता मनुष्य के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण गुण है। आत्मनिर्भर व्यक्ति
दूसरों पर निर्भर न होकर अपने परिश्रम से सफलता प्राप्त करता है। आत्मनिर्भरता से
आत्मसम्मान और आत्मविश्वास बढ़ता है। जो व्यक्ति अपनी जरूरतों के लिए दूसरों पर
निर्भर रहता है, वह कभी भी जीवन में आगे नहीं बढ़
सकता। हर सफल व्यक्ति आत्मनिर्भर होता है और कठिनाइयों का सामना कर अपने दम पर आगे
बढ़ता है। हमें आत्मनिर्भर बनने का प्रयास करना चाहिए ताकि हम अपने जीवन में सफलता
प्राप्त कर सकें।
5.
दयालुता मनुष्य का एक महान गुण है। दया से मनुष्य को समाज
में सम्मान और प्रेम प्राप्त होता है। दयालु व्यक्ति न केवल मनुष्यों के प्रति,
बल्कि पशु-पक्षियों
के प्रति भी संवेदनशील होता है। क्रूरता समाज में अशांति और वैमनस्य फैलाती है, जबकि दयालुता से सौहार्द बना रहता
है। हमें जरूरतमंदों की सहायता करनी चाहिए और अपने जीवन में दया का भाव बनाए रखना
चाहिए।
6.
मेहनत का फल हमेशा मीठा होता है। मेहनत करने वाला व्यक्ति
ही अपने जीवन में सफलता प्राप्त करता है। बिना परिश्रम के कोई भी व्यक्ति अपने
लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकता। जो लोग मेहनत से बचते हैं,
वे जीवन में पीछे रह जाते हैं।
इतिहास गवाह है कि सभी महान लोग कठोर परिश्रम के कारण ही सफल हुए हैं। हमें अपने
जीवन में परिश्रम को अपनाना चाहिए ताकि हम अपने सपनों को साकार कर सकें।
7.
मित्रता जीवन का एक अनमोल रिश्ता है। सच्चे मित्र जीवन के हर सुख-दुःख में साथ रहते हैं। मित्रता
में विश्वास और निष्ठा आवश्यक है। स्वार्थी
मित्रता अधिक समय तक टिक नहीं सकती। अच्छे मित्र जीवन को सुखमय बनाते हैं और बुरे
मित्र पतन का कारण बन सकते हैं। इसलिए हमें अच्छे मित्रों का चयन करना चाहिए और
मित्रता में सच्चाई और निष्ठा बनाए रखनी चाहिए।
8.
राष्ट्रप्रेम हर नागरिक का कर्तव्य है। जो व्यक्ति अपने देश
से प्रेम करता है, वह
सदैव उसके विकास के लिए कार्य करता है। स्वतंत्रता सेनानियों ने राष्ट्रप्रेम की
भावना से प्रेरित होकर देश के लिए बलिदान दिया। सच्चा देशभक्त वही है,
जो अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से
पालन करता है और समाज में एकता और शांति बनाए रखता है। हमें अपने देश से प्रेम
करना चाहिए और उसके विकास में योगदान देना चाहिए।

0 Comments