पाठ-4
छप्पय
नाभादास✍
नाभादास का परिचय
👉जन्म : 1570-
👉निधन : अज्ञात,
(1600 तक वर्तमान)
👉जन्मस्थान : सांप्रदायिक मान्यता के अनुसार दक्षिण भारत में, शैशव में पिता की मृत्यु और अकाल के कारण माता के साथ जयपुर (राजस्थान) में
प्रवास । दुर्योगवश माता से भी बिछोह ।
👉स्थाई
निवास : वृंदावन
👉शिक्षा :- गुरु की देख-रेख में स्वाध्याय, सत्संग द्वारा ज्ञानार्जन
👉दीक्षा
गुरु : स्वामी अग्रदास (अग्रअली), जो स्वामी रामानंद की शिष्य परंपरा के प्रसिद्ध कवि थे
👉अभिरुचि
: लोक भ्रमण, भगवद्भक्ति,
काव्य रचना, वैष्णव दर्शन-चिंतन में विशेष रुचि
👉कृतियाँ : भक्तमाल ( रचनाकाल 1585-1596 निर्धारित) , अष्टयाम
(ब्रजभाषा गद्य में) अष्टयाम ( 'रामचरितमानस' की दोहा चौपाई शैली में)
छप्पय का भावार्थ
कबीर
भगति विमुख जे
धर्म सो सब अधर्म करि गाए।
योग यज्ञ व्रत दान भजन बिन तुच्छ दिखाए।।
भावार्थ - उक्त पंक्तियाँ भक्तमाल के प्रसिद्ध कवि नाभादास द्वारा
रचित हैं, जिनमें उन्होंने कबीरदास की वाणी की विशेषता को दर्शाया है।
कवि का मत है कि जो व्यक्ति भक्ति से दूर हो जाता है, वह
अधर्म के मार्ग पर चला जाता है। कबीरदास का मानना था कि सच्ची भक्ति के बिना किए
गए सभी धार्मिक कर्म—योग, यज्ञ, व्रत,
दान, और भजन—निरर्थक हैं। यदि इन कर्मों में
भक्ति का भाव नहीं है, तो वे केवल दिखावे मात्र हैं और उनका
कोई वास्तविक मूल्य नहीं रह जाता।
अतः इस छप्पय के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि सभी धार्मिक क्रियाओं का
सारभूत तत्व "भक्ति" ही है। यदि व्यक्ति भक्ति से विमुख हो जाए, तो उसकी साधना और धर्म-कर्म व्यर्थ हो जाते हैं।
हिंदू तुरक प्रमान रमैनी सबदी साखी।
पक्षपात नहिं बचन सबहिके हितकी भाषी।।
भावार्थ - ये पंक्तियाँ नाभादास द्वारा रचित भक्तमाल
से ली गई हैं, जिनमें उन्होंने कबीरदास की वाणी की विशेषता को दर्शाया है।
कवि कहते हैं कि कबीरदास ने हमेशा सत्य और प्रमाण पर आधारित बातें कही हैं,
चाहे वह हिंदू हों या मुसलमान। उनकी वाणी में रामैनी (दोहा),
सबद (पद), और साखी (नीति वचन) का समावेश था, जो ज्ञान और भक्ति का मार्ग दिखाते
हैं।
कबीरदास कभी भी पक्षपाती नहीं रहे। उन्होंने किसी एक धर्म या संप्रदाय का पक्ष
नहीं लिया, बल्कि सभी के हित की बात कही। उनके शब्दों में
सत्य, प्रेम और समानता का संदेश था, जो
संपूर्ण मानवता के लिए उपयोगी है।
आरूढ़ दशा ह्वै जगत पै, मुख देखी नाही भ।
कबीर कानि राखी नहीं, वर्णोश्रम षट दर्शनी।।
भावार्थ - ये पंक्तियाँ नाभादास द्वारा रचित भक्तमाल
से ली गई हैं, जिनमें उन्होंने कबीरदास की वाणी की विशेषता को बताया है।
कवि कहते हैं कि कबीरदास ने कभी भी किसी के अनुसार या पक्षपातपूर्ण बात नहीं कही।
उन्होंने सिर्फ आँखों देखी सत्य बातें ही लोगों को बताई और सुनी-सुनाई बातों पर
ध्यान नहीं दिया।
कबीरदास ने चार वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र), चार आश्रम
(ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ,
संन्यास) और छः दर्शन (षड्दर्शन - न्याय, वैशेषिक,
सांख्य, योग, मीमांसा,
वेदांत) को कोई विशेष महत्व नहीं दिया। वे केवल सत्य और भक्ति को ही
प्रधान मानते थे और समानता का संदेश देते थे।
सूरदास
उक्ति चौज अनुप्रास वर्ण अस्थिति अतिभारी।
वचन प्रीति निर्वेही अर्थ अद्भुत तुकधारी।।
भावार्थ - ये पंक्तियाँ नाभादास द्वारा रचित भक्तमाल
से ली गई हैं, जिनमें उन्होंने सूरदास जी की काव्य-विशेषताओं का वर्णन किया है।
नाभादास कहते हैं कि सूरदास की रचनाएँ अत्यंत प्रभावशाली और अलंकारों से समृद्ध
होती हैं। उनकी कविता में युक्ति (तर्क), चमत्कार, अनुप्रास (ध्वनि-सौंदर्य) और वर्ण-विन्यास का अद्भुत संतुलन देखने को
मिलता है।
सूरदास की कविताएँ लयबद्ध और संगीतात्मक होती हैं। वे अपने काव्य में प्रेम और
भक्ति से भरे वचनों का उपयोग करते हैं और कविता का आरंभ और समापन समान रूप से
मधुरता से करते हैं। उनकी रचनाओं में गहरी भावनाएँ और अद्भुत तुकबंदी होती है,
जो पाठकों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं।
प्रतिबिंबित दिवि दृष्टि हृदय हरि लीला भासी।
जन्म कर्म गुन रूप सबहि रसना परकासी।।
भावार्थ - ये पंक्तियाँ नाभादास द्वारा रचित भक्तमाल
से ली गई हैं, जिनमें उन्होंने सूरदास जी की काव्य-विशेषताओं का उल्लेख किया है।
नाभादास कहते हैं कि सूरदास की दृष्टि दिव्य और हृदय में श्रीकृष्ण की लीलाओं से
परिपूर्ण है। उन्होंने अपनी रचनाओं में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म, कर्म, गुण और स्वरूप का अद्भुत वर्णन किया है।
सूरदास ने अपनी भावपूर्ण वाणी से प्रभु की लीलाओं को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया,
जिससे उनकी कविता में एक दिव्य आभा दिखाई देती है। उनकी वाणी इतनी
प्रभावशाली है कि हरि की लीलाएँ मानो शब्दों के माध्यम से उजागर हो जाती हैं।
विमल बुद्धि हो तासुकी, जो यह गुन श्रवननि धरै।
सूर कवित सुनि कौन कवि, जो नहिं शिरचालन करै।।
भावार्थ - ये पंक्तियाँ नाभादास द्वारा
रचित भक्तमाल से ली गई हैं, जिनमें उन्होंने सूरदास जी की
काव्य-विशेषताओं का उल्लेख किया है।
नाभादास कहते हैं कि जो व्यक्ति सूरदास की रचनाओं में वर्णित भगवान श्रीकृष्ण के
गुणों को ध्यानपूर्वक सुनता है, उसकी बुद्धि निर्मल हो जाती
है। उनकी कविता केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मानसिक और
आध्यात्मिक शुद्धि भी प्रदान करती है।
वे आगे कहते हैं कि ऐसा कोई कवि नहीं हो सकता, जो सूरदास की
कविताओं को सुनकर प्रभावित न हो और सहमति में सिर न हिलाए। उनकी रचनाएँ इतनी
प्रभावशाली और हृदयस्पर्शी हैं कि हर कोई उन्हें स्वीकार करता है।
CHHAPPAY OBJECTIVE QUESTION
1.
“छप्पय” शीर्षक कविता के रचयिता का नाम बतावें?
a)नाभादास
b)सूरदास
c)कबीरदास
d)तुलसीदास
2.
नाभादास का स्थायी निवास कहाँ था?
a)काशी
b)बरसाने
c)मथुरा
d)वृन्दावन
3.
भक्तमाल में कितने चरित वर्णित हैं?
a)201 भक्तो का चरित
b)202 भक्तों का चरित
c)203 भक्तों का चरित
d)200 भक्तों का चरित
4.
नाभादास
के अनुसार किसकी कविता को सुनकर कवि सिर झुका लेते है?
a)तुलसी दास
b)मलिक मुहम्मद जायसी
c)सुभद्रा कुमार चौहान
d)सूरदास
5.
नाभादास
का काव्य रचना क्षेत्र था?
a) हरिद्वार
b) काशी
c) मथुरा
d) वृन्दावन
6.
नाभादास
का जन्म कब हुआ था?
a)1570
b)1560
c)1575
d)1565
7.
नाभादास किसके शिष्य थे?
a)रामानंद
b)तुलसीदास
c)महादास
d)अग्रदास
8.
आपके पाठ्यक्रम में किन पर लिखे गए छप्पय संकलित हैं?
a)कबीर, सूर
b)सूर, तुलसी
c)तुलसी, अग्रदास
d)अग्रदास, छीतस्वामी
9.
नाभादास की ब्रज
भाषा गद्य की रचना कौन - सी है?
a) अष्टयाम
b) भक्तमाल
c) श्रीमाल
d) प्रवीण माल
10.
नाभादास
किसके समकालीन थे?
a)प्रेमचंद
b)भात्रेंदु
c)मलिक मुहम्मद जायसी
d)तुलसीदास
11.
नाभादास
की पारिवारिक पृष्ठभूमि किस वर्ण की थी?
a) ब्राह्मण
b) क्षत्रिय
c) दलित
d) वनवासी
12.
नाभादास
कैसे संत थे?
a)विरक्त जीवन जीते हुए
b)पारिवारिक जीवन जीते हुए
c)मंदिर में रहते हुए
d)व्यापारी बनकर रहते हुए
13.
भक्तमाल किस प्रकार की रचना है?
a)भक्त चरित्रों की माला
b)जीवनी
c)नाटक
d)संस्मरण
14.
सूर की
भक्ति किस कोटि की थी?
a) शस्य भाव
b) सख्य भाव
c) कांता सक्ति
d)रागात्मक
15.
कबीर दस
किस शाखा के कवि है?
a)सगुण शाखा
b)सर्वगुण शाखा
c)निर्गुण शाखा
d)इनमे से कोई नहीं
16.
कबीर के
अनुसार अधर्म करने वाले व्यक्ति कौन होते हैं?
a) अज्ञानी
b) अमर्यादित
c) भक्ति विहीन
d) कुकर्मी
17.
नाभादास
ने सूरदास को किस क्षेत्र में अद्भुत कहा है?
a) रसधारी
b) तुकधारी
c) विविधारी
d) वृतधारी
18.
नाभादास
जी किस समाज के विद्वान हैं?
a)दलित वर्ग
b)वैश्य वर्ग
c)आदिवासी
d)संथाल वर्ग
19.
आपकी पाठ्य-पुस्तक में संकलित छप्पय की ग्र्रंथ में संकलित है?
a)अष्टयाम
b)भक्त्माल
c)रामलला
d)इनमे से कोई नहीं
20.
नाभादास ने भक्तों के परिचय में किस शैली का
परिचय दिया
है?
a)संधि-शैली
b)समास-शैली
c)उपसर्ग-शैली
d)प्रत्यय-शैली
ANSWER
1.a 2.d 3.d 4.d 5.d 6.a
7.d 8.a 9.a 10.d 11.c 12.a 13.a 14.b 15.c 16.c 17.b 18.a 19.b 20.b
CHHAPPAY QUESTION ANSWER
1.
नाभादास
ने छप्पय में कबीर की किन विशेषताओं का उल्लेख किया है? उनकी क्रम से सूची बनाइए।
उत्तर: नाभादास ने कबीर की निम्नलिखित विशेषताओं का उल्लेख किया है-
i) कबीर ने हिंदू-मुसलमान दोनों को समान रूप से प्रमाण और सिद्धांत की बातें
बताईं।
ii) उन्होंने भगवद्भक्ति को ही श्रेष्ठ माना और अन्य सभी धार्मिक क्रियाओं को
अधर्म बताया।
iii) वे जाति-पांति और वर्णाश्रम व्यवस्था का खंडन करते थे।
iv) सच्चे प्रेम और भक्ति के बिना योग, यज्ञ,
व्रत, दान को
तुच्छ बताया।
2.
'मुख देखी नाहीं भनी' का क्या अर्थ है? कबीर पर
यह कैसे लागू होता है?
उत्तर: 'मुख देखी नाहीं भनी' का अर्थ है बिना
किसी पक्षपात के बोलना। कबीर ने अपने विचारों को निर्भीकता से व्यक्त किया, उन्होंने न तो किसी
से डरकर कुछ कहा और न ही किसी को खुश करने के लिए। वे केवल सत्य पर आधारित विचार
रखते थे
3.
सूर के
काव्य की किन विशेषताओं का उल्लेख कवि ने किया है?
उत्तर: नाभादास ने सूरदास के काव्य की निम्नलिखित विशेषताएँ बताई
हैं—
उनकी कविता में अनुप्रास और चमत्कारिक भाषा होती है, प्रेम और भक्ति की गहरी भावना प्रकट
होती है, तुकबंदी का
अद्भुत प्रयोग होता है,
और वे अपनी दिव्य दृष्टि से श्रीकृष्ण की लीलाओं का सुंदर वर्णन करते हैं।
4.
"पक्षपात नहिं वचन सबहि के हित की भाषी" इस पंक्ति में कबीर के किस गुण का परिचय दिया गया है?
उत्तर- इस पंक्ति से स्पष्ट होता है कि कबीर
निष्पक्ष थे। उन्होंने हिंदू-मुसलमान, जाति-पांति का भेदभाव नहीं किया। वे केवल सत्य की बात करते थे और
उनके वचन सबके हित के लिए होते थे। वे सिद्धांतवादी थे और अपने विचारों पर अडिग
रहते थे।
5.
कविता
में तुक का क्या महत्व है? इन छप्पयों के संदर्भ में स्पष्ट करें।
उत्तर: तुकबंदी कविता में लय, माधुर्य और प्रवाह
लाती है। कबीर और सूरदास के छप्पयों में तुकबंदी से काव्य अधिक प्रभावशाली और गेय
बन जाता है। जैसे "गाए-दिखाए" और "भाषी-दर्शनी" जैसी
तुकबंदी काव्य में आकर्षण बढ़ाती है और श्रोता को भावनात्मक रूप से जोड़ती है।
6.
"कबीर कानि राखी नहीं" से क्या तात्पर्य है?
उत्तर: 'कबीर कानि राखी नहीं' का अर्थ है कि
उन्होंने किसी परंपरा,
लीक या समाज की मान्यताओं को बिना तर्क स्वीकार नहीं किया। वे कहते हैं कि
ज्ञान का आधार अनुभव होना चाहिए,
न कि केवल ग्रंथों में लिखी बातें। उन्होंने वर्णाश्रम, जाति-पांति
और परंपराओं को नकारा।
7.
कबीर ने
भक्ति को कितना महत्व दिया है?
उत्तर: कबीर ने भक्ति को सर्वोपरि माना और इसे ईश्वर-प्राप्ति
का सबसे सरल साधन बताया। उन्होंने कहा कि भक्ति के बिना धर्म, योग, यज्ञ, दान, व्रत सब व्यर्थ
हैं। उनके अनुसार,
जो व्यक्ति भक्ति से विमुख है, वह सच्चे धर्म का पालन कर ही नहीं सकता।

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